कागज़ पे बिखर के मैं अंगार हो जाता हूँ....!
आदाब , सभी शायरी के रहनुमाओं को मेरा ... ये जो ग़ज़ल मैं आपके रू-बा-रू कर रहा हूँ ... इस ग़ज़ल का बहर हजाज़ मख्फूफ़ महजूफ रहता ... पर एक तक्ता ज्यादा रहा .. तो कोई तकनीकी बहर नहीं बनती .... ============================ बहर:- {2211 2211 2211 222 (गिनत...
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Kunaal
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[17 Dec 2009 13:24 PM]



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