मज़े का अर्थशास्त्र ....
जब भी वो मुझसे टकराती है मुझे याद दिलाना नहीं भूलती कि मैं कितने मज़े में हूँ. मैं ईश्वर के इस खेल को समझ नहीं पाती हूँ , मेरे लिए जो एक अमूर्त वस्तु है , उनके लिए वही मूर्त कैसे हो जाती है , ज़रूर ये सरकारी योजनाओं के सदृश्य हैं , जिनमें पैसा तो बहु...
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Shefali Pande
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[17 Dec 2009 10:46 AM]



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