अजीब दिन थे
अजीब दिन थे । जब शामें सूरज के ढलने के बाद शुरू होती थीं । जब रातों के जल्दी बीत जाने का मलाल हुआ करता था । जब खुशियों को ढूँढते रहने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी । जब समय दबे पाँव आकर गुज़रता जाता था । जब ना ख्वाहिशों ने जन्म लिया था और न आरजूयें थी । जब...
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अनिल कान्त :
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[17 Dec 2009 09:59 AM]



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