जाने क्यूँ...

अंतर्द्वंद का आइना जाने क्यूँ... तन पर ओढी मायूसी की चादर उतारकर बेरंग जमाने पर रंग उडाने का जी नहीं करता! जाने क्यूँ... फुलझडी जलाकर रौशनी की बूंदे पसरे अंधकार पर छिडकने का जी नही करता! जाने क्यूँ... अहले सहर पत्तों पे बिखरे शबनमी मोटी उठाकर आँखों से लगाने का जी नहीं... [पूरी पोस्ट]
writer knkayastha
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[17 Dec 2009 08:05 AM]

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