ख़्वाहिशों की शाम ढलती है !!

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति अजीब दिन थे । बाहों में बाहें डाले चहलकदमी करते रहने के दिन । उतरते हुए सूरज और ढलती हुई शामों के दिन । दूजे के हाथों प्रेम संदेशा पहुँचाने के दिन । गली के नुक्कड़ पर उसका इतंजार करते रहने के दिन । किताबों के आखिरी सफहों पर मन में पिघल रहे कुछ शब्दों... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल कान्त :
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[17 Dec 2009 08:05 AM]

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