बिटियाएँ
बिटियाएँ कविता वाचक्नवी पिता !
अभी जीना चाहती थीं हम यह क्या किया........
हमारी अर्थियाँ उठवा दीं !
अपनी विरक्ति के निभाव की
सारी पग बाधाएँ
हटवा दीं.......! अब कैसे तो आएँ तुम्हारे पास? अर्थियों उठे लोग
(दीख पड़ें तो)
प्रेत कहलाते हैं
‘भूत’(काल) हो जा...
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कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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[16 Dec 2009 18:57 PM]



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