कवि-सम्मेलन में आज आनन्द लीजिये अमृता प्रीतम की अद्भुत और अभिनव कविता आदि धर्म का

Kavi Sammelan आदि धर्म मैंने जब तू को पहना तो दोनों के बदन अन्तर्ध्यान थे अंग फूलों की तरह गूंथे गये और रूह की दरगाह पर अर्पित हो गये ..... तू और मैं हवन की अग्नि तू और मैं सुगन्धित सामग्री एक दूसरे का नाम होठों से निकला तो वही नाम पूजा के मंत्र थे , यह तेरे और मे... [पूरी पोस्ट]
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[16 Dec 2009 15:18 PM]

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