कवि-सम्मेलन में आज आनन्द लीजिये अमृता प्रीतम की अद्भुत और अभिनव कविता आदि धर्म का
आदि धर्म मैंने जब तू को पहना तो दोनों के बदन अन्तर्ध्यान थे अंग फूलों की तरह गूंथे गये और रूह की दरगाह पर अर्पित हो गये ..... तू और मैं हवन की अग्नि तू और मैं सुगन्धित सामग्री एक दूसरे का नाम होठों से निकला तो वही नाम पूजा के मंत्र थे , यह तेरे और मे...
[पूरी पोस्ट]
AlbelaKhatri.com
28
10
0
10
4
[16 Dec 2009 15:18 PM]



Shuffle








