इक सुराख से ....
हर कश्ती का ख्वाब होता है समन्दर, पर हर कश्ती डरती है इक सुराख से । मानव तन पे अभिमान जीते जी कितना, अंत होता तन का तो बन जाता राख ये ।...
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sada
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[16 Dec 2009 05:46 AM]



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