दिलीप चित्रे और सेल्यूलॉयड पर लिखी उनकी एक कविता के बारे में
धीरे धीरे आओ, जैसे आता है शोक या फुर्सत से आओ जैसे आती है दर्द की याद जो सुन्न हुए दर्द से भी गहरी यातना देती है दिलीप चित्रे की कविता 'धीरे धीरे' से लिखना तभी सार्थक होता है जब तक कि वह एक विवशता न बन जाए। मैं काम करते, सड़कों पर चलते, सिनेमा देखते,...
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[16 Dec 2009 03:57 AM]



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