मुरली तेरा मुरलीधर 40

अखिलं मधुरम् तिल तिल तरणी गली नहीं दिन केवट के बहुरे मधुकर वरदानों के भ्रम में ढोया शापों का पाहन निर्झर सेमर सुमन बीच अटके शुक ने खोयी ऋतु वासंती टेर रहा मानसप्रबोधिनी मुरली   तेरा    मुरलीधर।।216।। देह गेह कोई न तुम्हारा नश्वर संयोगी मध... [पूरी पोस्ट]
writer हिमांशु । Himanshu
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[16 Dec 2009 03:51 AM]

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