इक बार तुम्हें देखा जिसने सब होश गवां बैठे अपने.
ग़ज़ल होटों का तबस्सुम समझे हैं, आँखों की ज़बा भी जाने हैं. लाखों में तुम्हें अय जाने-ग़ज़ल, हम दूर से ही पहिचाने हैं. इक बार तुम्हें देखा जिसने, सब होश गवां बैठे अपने, मस्ज़िद से नमाज़ी भी ग़ुम हैं, सूने-सूने बुतखाने हैं. चूमें हैं तुम्हारे गालों को...
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डॉ.सुभाष भदौरिया.
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[16 Dec 2009 03:48 AM]



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