इक बार तुम्हें देखा जिसने सब होश गवां बैठे अपने.

डॉ.सुभाष भदौरिया.अहमदाबाद. ग़ज़ल होटों का तबस्सुम समझे हैं, आँखों की ज़बा भी जाने हैं. लाखों में तुम्हें अय जाने-ग़ज़ल, हम दूर से ही पहिचाने हैं. इक बार तुम्हें देखा जिसने, सब होश गवां बैठे अपने, मस्ज़िद से नमाज़ी भी ग़ुम हैं, सूने-सूने बुतखाने हैं. चूमें हैं तुम्हारे गालों को... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ.सुभाष भदौरिया.
views
32
upvote
4
downvote
0
rating
4
comments
8
[16 Dec 2009 03:48 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix