चित्र कविता - 2 (एक ग़ज़ल)
पिछले दिनों नीरज जी की पोस्ट में यह चित्र देखा था. बहुत कुछ कह रहें है ये सजीव चित्र. इसे देखकर स्वतः ही लेखनी चल पड़ी. हँसते बोलते कहीं खो जाओ ये अच्छा तो नहीं है
अपने मन को बस दुखाओ ये अच्छा तो नहीं है मैं जानता हूँ मेरी जाँ मैं तुमसे दूर हूँ बहुत
स...
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सुलभ सतरंगी
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[16 Dec 2009 00:48 AM]



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