दुश्मन यार जमाना है
खुद को ही समझाना है यानि पहाड़ उठाना है प्यार कभी होता होगा अब तो यार फ़साना है केवल शक के कारण ही उलझा तान-बाना है नाचे है, क्यों दिल मेरा मौसम खूब सुहाना है उसका बचना मुश्किल है दुश्मन यार जमाना है आज नहीं तो कल यारा लौट सभी को जाना है तुमसे दूर ‘सखा...
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श्याम सखा 'श्याम'
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[15 Dec 2009 22:59 PM]



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