मुद्दे हम बनाते हैं...
महंगाई के इस दौर में जार-जार होकर जनता बस इतना ही कह पाती है- हमारी कोई नहीं सुनता किसी को नहीं हमारी फिकर... लेकिन क्या हम अपनी बदहाली के खुद जिम्मेदार नहीं... आज़ादी के ६ दशकों बाद भी नहीं है हम अपनी पेट भरने को आश्वस्त और ना ही है हमें रोजगार पाने...
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Sundip Kumar Singh
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[15 Dec 2009 12:31 PM]



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