सामजिक सुरक्षा - नया नजरिया
नंदन नील्केड़ी की किताब imagining India से अनुवादित अंश हममें से अधिकतर लोग यह सोचकर जीते हैं, जैसे इस धरती पर हमारा अस्तित्व सदा के लिए बना रहेगा। बेरोजगारी, बीमारी और लगातार बूढ़े होते जाने के बार में हम शायद ही सोचते हैं। चेहरों की झुर्रिया, ढीली...
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sanjeev persai
बात पते की
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[15 Dec 2009 01:23 AM]



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