क्षणिकाएँ...

कुछ मेरी कलम से -kuch  meri kalam se ** १)उलझन बनो तुम चाहे मेरी कविता चाहे बनो अर्थ चाहे बनो संवाद , पर मत बनो ऐसी उलझन जिसे में कभी सुलझा न सकूं ! २)तन्हा चाँद भी तन्हा तारे भी हैं अकेले और हम भी उदास से उनकी राह तकते हैं तीनो हैं तन्हा एक साथ फ़िर भी क्यों इस कदर अकेले से दिखते हैं ? ३)च... [पूरी पोस्ट]
writer रंजना [रंजू भाटिया]
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[15 Dec 2009 01:08 AM]

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