ग्लोबल - ग़ज़ल
अरहर का दाना भी गोया , सोना लगता है। आदमी बाज़ार में अब तो , बौना लगता है॥ आजमा कर देख कोई , ब्रांड वाली क्रीम। यार उम्मीद ! चेहरा तेरा , रोना लगता है॥ खूब हुए ग्लोबल क्या कहना ,ग्लोबल दुनिया में। चौराहे पर पहुँचा घर का , कोना लगता है॥ हरेक ज़रूरत सच्च...
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Deepak Tiruwa
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[14 Dec 2009 21:18 PM]



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