कोई घर ना फिर से उजड़ जाए.....

दिशाएं फिर कहीं राख को कोई कुरेद रहा। चिंगारी कहीं कोई ना भड़क जाए। नफरत की इस आँधी में कहीं यारो, कोई घर ना फिर से उजड़ जाए। बहुत सोच समझ कर उठाना ये कदम अपना। कदम कदम पे बारूद मुझ को दिखता है। आज पैसो की खातिर मेरे वतन मे यारों जीना मरना भी यहाँ अब बिकता है... [पूरी पोस्ट]
writer परमजीत बाली
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[14 Dec 2009 13:54 PM]

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