आज की कविता के बारे में

वैतागवाड़ी आज की कविता के बारे में कुछ भी बोलने से पहले मैं उस समाज के बारे में सोचता हूं, जिसमें मैं रहता हूं, जो कि बोर्हेस के शब्‍दों में ‘स्‍मृतियों और उम्‍मीदों से पूर्णत: मुक्‍त, असीमित, अमूर्त, लगभग भविष्‍य–सा’ है; मैं उस भाषा के बारे में सोचता हूं, जिसम... [पूरी पोस्ट]
writer Geet Chaturvedi

भारत भूषण अग्रवाल

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[14 Dec 2009 13:21 PM]

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