देवदास सा मैं पागल
न मदिरा कि प्यास मुझे, ना काम बिना मदिरा चलता | न देवदास सा मैं पागल , न बिन पारो ही मन लगता | ग्वालाये रास नहीं आती, नाही राधा ही मन भाती | न कोई स्वर्ग कि चाह मुझे, न बिना मेनका आँख लगे | व्यथा मेरी सुनकर अक्सर, संसार ये कहता है हंस...
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Tapashwani Anand
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[14 Dec 2009 09:57 AM]



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