अपने को कहाते हैं देखो तो वो फ़ुरसतिया.

डॉ.सुभाष भदौरिया.अहमदाबाद. ग़ज़ल जिस दिन वो मुहब्बत से घर अपने बुलायेंगे. जूठे ही सही उनके हम बेर भी खायेंगे. अपने को कहाते हैं, देखो तो वो फ़ुरसतिया, ज़ख़्मों को हमारे हम फ़ुर्सत से दिखायेंगे. शीरी थी ज़बा अपनी, ये तल्ख़ हुई कैसे ? रूदादे सफ़र अपना, हम उनको सुनायेंगे. बिछुड़े... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ.सुभाष भदौरिया.
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[14 Dec 2009 06:40 AM]

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