उठ आये हैं प्रश्न हज़ारों

गीत कलश तुमने मुझसे कहा लिखूं मैं गीत तोड़ कर सब सीमायें मैं लिखने बैठा तो मन में उठ आये हैं प्रश्न हज़ारों क्या मैं लिखूं न समझा जाये जिसे एक परिपाटी केव आंसू क्रन्दन मुस्कानें या उपज रही पीड़ा की बातें प्रीतम के भुजपाशों के पल, दृष्टि साधना के मोहक क्षण या फि... [पूरी पोस्ट]
writer राकेश खंडेलवाल
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[13 Dec 2009 20:47 PM]

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