फिर भी इन्द्रधनुष देखेंगे
आती रुत के मन पर घाव जाती रुत के ज़ख्म हरे हैं कुछ खोया है कुछ पाया है नश्तर ये काफ़ी गहरे हैं फिर भी इन्द्रधनुष देखेंगे फिर भी हम पकड़ेंगे चाँद आंसू वाली आँखों में उम्मीदों के भी रंग भरे हैं...
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[13 Dec 2009 07:51 AM]



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