ग़ज़ल... तो नहीं...

अंतर्द्वंद का आइना जिंदगी ईंटों से बनी कोई इमारत तो नहीं! कब्रिस्तान में लाशों को शिकायत तो नहीं? सिकंदर बड़े-बड़े वक्त की मिट्टी में मिले, मौत शहंशाह की भी क़यामत तो नहीं! दाग मेरे दामन में थे पुराने कितने, दिखाया था तुझे, की वकालत तो नहीं। मासूमों के खून से रंगी है सर... [पूरी पोस्ट]
writer knkayastha
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[12 Dec 2009 23:06 PM]

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