जिंदगी का सफ़र...
याद है , वो पहली मंजिल , जहाँ सचेत किया था , रास्ते ने मुझे , के ऐ मुसाफिर , थमना नहीं , कई मुकाम बाकी है , जीतने के लिए , मुकम्मल जहान बाकी है ... चाँद सूरज गिने तो क्या , तारों से भरा , ये आसमान बाकी है ... फिर क्या , चलते ही जा रहे , उस राह पर हम...
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अम्बरीश अम्बुज
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[12 Dec 2009 15:39 PM]



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