पुरस्कृत
भाव जो मन में रहे , कभी शब्द न बने , वृंत पर पुष्प -से खिले , साँझ झरे नही, अपने ही सौरभ में लीन हो गए....... उन्हें भी जान लिया तुमने , हतप्रभ , अकिंचन मै चढ़ा भी न सका उन्हें ठीक से , फिर भी मंदस्मित स्नेहिल स्वीकारोक्ति से अर्पित उन्हें बना लिया त...
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Aarjav
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[12 Dec 2009 10:21 AM]



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