अजनबी बन कर रहोगे, कब तलक.
पुरानी डायरी से एक और रचना. अजनबी बन कर रहोगे कब तलक अजनबी बन कर रहोगे, कब तलक बात दिल की ना कहोगे, कब तलक आग भड़का दी है ऐसी, प्रीत ने प्रीत में जलते रहोगे, कब तलक अजनबी बन कर रहोगे, कब तलक............ आरज़ू कर लो कभी तो, स्वप्न की या उन्हें दे...
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योगेश स्वप्न
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[12 Dec 2009 07:18 AM]



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