कवि सम्मेलन में आज पेश है दुष्यंत कुमार की सुविख्यात ग़ज़ल - हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
हो गई है पीर पर्वत सी , पिघलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए आज यह दीवार , परदों की तरह हिलने लगी शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए हर सड़क पर , हर गली में , हर नगर , हर गाँव में हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए सिर्फ़ हंगामा खड़ा करन...
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[12 Dec 2009 02:36 AM]



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