लसोढ़े के अचार, बेर के चूरन और कुल्‍हड़ों वाली शाम

बतकही इलाहाबाद गई थी तो प्रतापगढ़ वाले जीजा बोले--'ममता अचार तो नहीं चाहिए । कहो तो ला दें ।' अचार मेरी कमज़ोरी रहा है । जब 'प्रेग्‍नेन्‍ट' थी तो किसी ने वादा किया था कि आपके लिए 'लसोडे़' का अचार भेजेंगे । ये अचार ना आना था ना आया । बहरहाल.....कल के अख़बार... [पूरी पोस्ट]
writer ममता सिंह
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[11 Dec 2009 22:14 PM]

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