स्वर अपरिचित ...
बीती रात मैंने चाँद से बातें की । बतियाते मन उससे एकाकार हुआ । रात्रि के सिरहाने खड़ा चाँद तनिक निर्विकार हुआ , बोला - "काल का पहिया न जाने कितना घूमा न जाने कितनी राहें मैं स्वयं घूमा और इस यात्रा में - जीवन से मृत्यु की अविराम- सब कुछ हुआ ज्ञ...
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हिमांशु । Himanshu
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[11 Dec 2009 07:33 AM]



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