भाषात्‍कार का ज़माना

कछु ह‍मरी सुनि लीजै भाषात्‍कार का ज़माना लोग जो बोलते हैं, जो लिखते हैं और फिर जो हमें छपा हुआ दीखता है उसे देखकर लगता हैं कि हम उस युग में आ चुके हैं जिसे 'भाषात्‍कार का युग' मज़े में कहा जा सकता है। दरअसल मनुष्‍य अपने जीवन में जितनी तरह के बलात्‍कार करता है, उनमें से... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. कमलकांत बुधकर
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[11 Dec 2009 06:59 AM]

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