मिर्ज़ा ग़ालिब जी के कुछ शेर
सताइशगर है ज़ाहिद इस क़दर जिस बाग़े-रिज्वाँ का, वह इक गुल्दस्त: है हम बेखु़दों के ताक़े-निसियाँ का । ग़ालिब ने बार बार स्वर्ग एवं स्वर्ग में प्राप्त चीजों की हँसी उड़ाई है । यहाँ भी वे कहते हैं कि ज़ाहिद (परहेज़गार, संयमी) जिस स्वर्गोद्यान की इतनी प्रशं...
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अनिल कान्त :
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[11 Dec 2009 01:30 AM]



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