सुन रही हो तुम ?

दस्तावेज बेतरतीब से दिन , चिंदी चिंदी हो चुकी रातों के बीच कोई वक़्त तो होगा ? जब तुम हमारे साथ होते होगे रगड़ रहे होगे अपनी मुट्ठियों में मेरी अँगुलियों को कुछ लिखा मिटाने को , कुछ अलिखा बनाने को बंद कर ली होंगी अपनी आँखों में मेरी आँखें तुमने बिस्तर में - ख... [पूरी पोस्ट]
writer आवेश
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[11 Dec 2009 00:42 AM]

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