मुरली तेरा मुरलीधर 38
वह विराम जानता न क्षण क्षण झाँक झाँक जाता मधुकर दुग्ध धवल फूटती अधर से मधुर हास्य राका निर्झर प्रीति हंसिनी उसकी तेरे मानस से चुगती मोती टेर रहा है अविरामछंदिनी मुरली तेरा मुरलीधर।।206।। अंगारों पर भी प्रिय से अभिसार रचाता चल मधुकर...
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हिमांशु । Himanshu
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[10 Dec 2009 22:35 PM]



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