कुछ अपने मन की
वो महफ़िल में आये, और दिल-ए-महफ़िल को चुरा ले गए.. आलम ऐसा हुआ इस महफ़िल का, हम पानी को शराब समझकर पी गए... हम निकले थे ज़माने को अपना बनाने.. हम निकले थे ज़माने को अपना बनाने.. पर पूरी कायनात में कोई बेगाना ही ना मिला... इन हसीनों के भंवर में ना पड़ बन्दे...
[पूरी पोस्ट]
Pratik Maheshwari
शायरी
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[10 Dec 2009 08:07 AM]



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