दिन और रात के बीच
बेतरतीब से दिन ,चिंदी चिंदी हो चुकी रातों के बीच कोई वक़्त तो होगा? जब तुम हमारे साथ होते होगे रगड़ रहे होगे अपनी मुट्ठियों में मेरी अँगुलियों को कुछ लिखा मिटाने को ,कुछ अलिखा बनाने को बंद कर ली होंगी अपनी आँखों में मेरी आँखें तुमने बिस्तर में - खुद...
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आवेश
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[10 Dec 2009 04:01 AM]



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