फोन नंबर से जली उंगलियाँ

राजेश गुप्ता आपसे रूबरू मेरे एक मित्र मिलने आये, फोन माँगा और मेरी तरफ देखते ही देखते उन्होंने नंबर डायल कर दिया, गोया ज़नाब की उँगलियों में आँखे हों. बस तभी सूझीं ये पंक्तियाँ :- कुछ फोन नंबर थे इस कदर इश्कियां जिन्हें याद रखती थी हमारी उँगलियाँ जिनको डायल करके मिलती थी दु... [पूरी पोस्ट]
writer WindEnergyMan

hindi poetry

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[09 Dec 2009 21:22 PM]

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