ट्रेन छूटे हुए इक ज़माना हुआ.

डॉ.सुभाष भदौरिया.अहमदाबाद. ग़ज़ल दिल को टूटे हुए इक ज़माना हुआ. भाग फूटे हुए इक ज़माना हुआ. प्लेटफार्म पे हम ताकते रह गये, ट्रेन छूटे हुए इक ज़माना हुआ. वो न आये मनाने हमें आज तक, हमको रूठे हुए इक ज़माना हुआ. फिर मिलेंगे दुबारा किसी मोड़ पर, वादे हुए झूटे हुए इक ज़माना हुआ. इस... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ.सुभाष भदौरिया.
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[09 Dec 2009 07:13 AM]

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