हिंदी का बुद्धिजीवी
लेखक संगठनों के पुनर्गठन का मसला इस संपादकीय के साथ जोड़ कर देखा जाएगा तो परिवर्तन की जरूरत और शिद्दत से महसूस होगी. माहौल को गरियाना , राजनीति को लतियाना , युवा पीढ़ी पर बिगड़ जाने के फतवे जारी करना और फिर व्यवस्था के मत्थे दोष मढ़ देना एक फैशन है।...
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anup
संपादकीय
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[09 Dec 2009 03:14 AM]



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