आज भी…
क्या अब भी मिलती हो तुम, सबसे वैसे ही मुस्कुरा कर, या तेरे अंदर भी बना लिया, है खामोशी ने अपना घर... बोल पाती हो वैसे ही सब, शब्द शब्द अक्षर अक्षर, या फिर मेरी बातों में, काँप सा जाता है तेरा स्वर... अब...
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अम्बरीश अम्बुज
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[08 Dec 2009 16:33 PM]



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