हुआ इश्क में रुस्वां, इक नई पहचान ढूंढता हूँ

जीवन के पदचिन्ह मुसाफिर हूँ यारों, इक शहर अनजान ढूंढता हूँ हुआ इश्क में रुस्वां,  इक नई पहचान ढूंढता हूँ मजहब के वादों पर मरते  रोज़ इंसान देखता  हूँ बता दे जो खुदा को मेरा दर्द,  वो अजान ढूंढता हूँ दहशत मे... [पूरी पोस्ट]
writer Sudhir (सुधीर)

चिंतन

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[08 Dec 2009 14:10 PM]

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