प्रीत के वट-वृक्ष!
प्रीत के वट-वृक्ष! - कविता वाचक्नवी फूल बरसे थे नहीं
औ’ भीड़ ने मंगल न गाए
ढोलकों की थाप
मेहंदी या महावर
हार, गजरे, चूड़ियाँ
सिंदूर, कुमकुम
था कहीं कुछ भी नहीं, कुछ छूटने का भय नहीं। गगन ने मोती दिए थे
लहलहाती ओढ़नी दी थी धरा ने
और माटी ने महावर पाँव...
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कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
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[08 Dec 2009 14:09 PM]



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