आंसुओं का हिसाब-हिन्दी व्यंग्य कविता (ansuon ka hisab-hindi sahitya kavita)
शानदार इमारतों के नीचे दबे पड़े हैं, बुनियाद में जो पत्थर वह चमकदार नहीं होते। अमीर इंसानों की दौलत के आंकड़े खातों में लिखे होते पर उसको बढ़ाने वाले मेहनतकशों के पसीने की बूंदों के हिसाब नहीं होते। रौशनी फैली है जहां तक वहां तक पूरा जहां चमक रहा...
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दीपक भारतदीप
sher
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[08 Dec 2009 13:18 PM]



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