चट्टानों से छन कर निकले
चट्टानों से छन कर निकले । तो जल गंगा बनकर निकले । जो थोड़ा सर ख़म कर निकले वे दो अंगुल बढ़कर निकले । तलवारें तिरसूल गलें तो फिर कोई हल ढलकर निकले । कर्मों पर विश्वास नहीं था सो ज्यादा बन-ठन कर निकले । जो जितने ज्यादा ओछे थे वे उतना ही तनकर के निकले । व...
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joshi kavirai
पुस्तक - बेगाने मौसम
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[08 Dec 2009 12:34 PM]



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