चट्टानों से छन कर निकले

जोशी कविराय  - Joshi Kavirai चट्टानों से छन कर निकले । तो जल गंगा बनकर निकले । जो थोड़ा सर ख़म कर निकले वे दो अंगुल बढ़कर निकले । तलवारें तिरसूल गलें तो फिर कोई हल ढलकर निकले । कर्मों पर विश्वास नहीं था सो ज्यादा बन-ठन कर निकले । जो जितने ज्यादा ओछे थे वे उतना ही तनकर के निकले । व... [पूरी पोस्ट]
writer joshi kavirai

पुस्तक - बेगाने मौसम

views
16
upvote
1
downvote
0
rating
1
comments
1
[08 Dec 2009 12:34 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix