कुछ निराशावादी लाइनें जिनकी आस नहीं थी...
निराशा (1) खिलना चाहता था कहीं सुदूर व्योम में, बनना चाहता था समिधा किसी होम में। धूप में भी तो कभी नहीं वो हंस पाया हवा ओ अंधेरे ने जो 'प्रदीप' बुझाया।। (2) थरथराता धुआं जब मां मेरी बेरोजगारी पर आंसू बहाया करती है, चुपके से अपनी ही ओढ़नी में आंखें छु...
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चेतना के स्वर
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[08 Dec 2009 10:30 AM]



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