विचारमाला ....
आस्था जो कि विश्वास का दूसरा रूप है, अब वह किसी के प्रति हो, चाहे ईश्वर के प्रति हो, माता-पिता के लिए हो, अपने गुरूजनों के लिए हो, मन में जाने कैसे इसके बीज अंकुरित हो जाते हैं जब से हम होश संभालने लायक होते हैं, आजकल तो नासमझ छोटे बच्चे भी जब दे...
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sada
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[08 Dec 2009 01:43 AM]



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