अमृत प्यार
अमृत प्यार माँ के प्यार की महिमा का, करता हूँ गुणगान, कभी कमी न प्यार में होती, कैसी है यह खान . कष्ट जन्म का सहती है, फिर भी लुटाती जान, सीने से चिपकाती है, हो कैसी भी संतान . छाती से दूध पिलाती है, देती है वरदान, पाकर आंचल की छांव, मिलता है सुख बड़...
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Kavi Kulwant
अमृत प्यार
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[08 Dec 2009 00:52 AM]



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