मै, तुम, बेटा और दीवारे….
कभी कभी बस किसी का लिखा दिल को छू जाता है…कुछ लफ़्ज कभी नही भूलते, कुछ ज़ुमले बस जबा से लग जाते है… ऐसी ही एक कविता मैने हाल मे ही पढी ( चिट्ठाचर्चा के सौजन्य से)…और न जाने क्यू बार बार पढने को मन होता है…… मैने सोचा कि मै अपने ब्लाग के माध्यम से उन्हे...
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Pankaj Upadhyay
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[07 Dec 2009 19:56 PM]



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