ये सही हैं, क्योंकि ये संपादक हैं?

बेबाक टिप्पणी बुद्धिजीवियों के सामने जैसे ही संपादक शब्द आता है, चंद ही सेकेण्ड में उनके चेहरे के भाव चढऩे-उतरने लगते हैं। सहसा शांत हो जाता है क्योंकि तब उनके सम्मुख एक ऐसे व्यक्ति का चेहरा उभरकर सामने आता है, जो विद्वानों का विद्वान होता है। सबका दर्द हरण करने व... [पूरी पोस्ट]
writer रविकांत प्रसाद
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[07 Dec 2009 16:28 PM]

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