जीवन में पुरूषार्थ और भाग्य.दोनों का ही अपना अपना महत्व है...............
भाग्यं फलति सर्वत्र न विधा न च पौरूषम शुराग कृ्त विद्याश्च:,वने तिष्ठंति मे सुता: " पांडवों की माता कुन्ती श्रीकृ्ष्ण से कहती है कि मेरा पुत्र महापराक्रमी एवं विद्वान है किन्तु हम लोग फिर भी वनों में भटकते हुए जीवन गुजार रहे हैं,क्...
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पं.डी.के.शर्मा"वत्स"
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[07 Dec 2009 07:15 AM]



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